अत्याचार, भ्रष्टाचार, समाज में चल रही कुरितीयों के खिलाफ आवाज उठानेवाले पत्रकारोंको संगठन की जरूरत क्यों पडती है? इस सवाल का साधा जवाब देवता माझे कभी संभव नहीं हुआ। पत्रकार के हातों में इतनी ताकत है की वर हर किसी की समस्यांओं का समाधान कर सकती है, फिर ऐसी क्या जरूरत आन पडती है की संगठन बनाया जाय?
बदलतें हालातों में पत्रकारिता की दिशा और दशा भी बदली है. स्वतंत्रता के पूर्व और उसके बाद वाले पत्रकारिता और अब के जमाने की पत्रकारिता में गुणात्मक फर्क है। तब पत्रकारिता विचारों के लिए होती थी,अब विचारों के साथ खबरों के लिए भी होती है। तब दुश्मन एक था अब कई सारे है और वो भी हर वक्त बदलते रहतें है। कुछ लोग कहते है कि पत्रकारिता का स्तर फिसल गया है, इसलिए पत्रकार टार्गेट किए जाते है। मैं इस बात ये सहमत नहीं हूॅं। समाज में अच्छे बुरे लोग-संस्था-शक्ती हर क्षेत्र में होती है, पत्रकारिता में भी ऐसी बुरी शक्तीयाॅं आ चुकी है। लेकीन इसका मतलब कतई ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता का असली धर्म बदल चुका है। पत्रकारिता में आई हुई बुरी शक्तीयों से भी हमें लडना होगा। साथ ही हमें पत्रकारिता के विकास और उत्कर्ष के लिए भी लडना होगा। अगर ये काम करने से हम चूॅंक गए तो शायद इतिहास हमें माफ नहीं कर पाएगा
हमारें सामने चुनौतीयाॅं कई है, कई बार हम खुद को असहाय महसूस करतें है। हम कहने के लिए तो जनतंत्र के चौथा स्तंभ है लेकीन क्या हम स्वतंत्र है। बाकी तीन स्तंभोंको एक सुरक्षा और अधिकारीक रूप प्राप्त हुआ है। पत्रकारोंको कई बार विशेष दर्जा मिलता तो जरूर है लेकीन वो कोई अधिकारीक तौर पर नहीं। अब संविधान के निर्माताओं- रचैताओं ने ऐसा क्यों किया? क्यों मिडिया को स्वतंत्र रखा? मुझे लगता है इसका पीछे गहरी सोच है। किसी भी वक्त देश के तीन स्तंभ देश की जनता के प्रती बेईमान हो सकते है, लेकीन जनता खुद के प्रति बेईमान कैसे होगी? मिडिया जनता की आवाज है। कुछ गलत तत्व इसमें आ सकते है, जरूर आ सकते है, लेकीन वो जनता की आवाज नहीं बन सकते, और न ही जनता की आवाज दबा सकते है।
जब देश में कुछ ठीक नहीं चल रहा हो, या फिर अराजकता की स्थिती पैदा हुई हो तो क्या करना चाहीए इसका नमुना मिडिया ने हाल ही में पेश किया। हमारें संविधान ने ऐसी रचना की हुई है कि, लोगों की आवाज को कोई नहीं दबा सकता, मिडिया वाले भी नहीं। सोशल मिडिया के माध्यम से भी लोग अल्टरनेट मिडीया का रास्ता अपना रहे है। इसका विरोध नहीं करना चाहीए। जनता हमें भी सवाल पुछना चाहती है। अल्टरनेट मिडीया का हमें स्वागत करना चाहीए । इस नए माध्यम के सहारे लोग हमारी आलोचना करेंगें, दिशा देंगे, जानकारी देंगे, बदनाम भी करेंगें । ये मिडीया है, लोग जिस तरह आज इसका उपयोग कर रहें है वो मिडीया के ठेकेदारों के लिए भी एक सबक है। हमें लोगों की नब्ज और मिजाज को समझना चाहीए। उनकें मुद्दोंसे भटकना नहीं चाहीए। ऐसा करने के लिए बहुॅत साहस की आवश्यकता है।
कम पैसा, सैलरी के दम पर इतनी बडी लडाई कैसे लडे ये भी बडी समस्या है। मिडीयाकर्मीयों की सैलरी, सुरक्षा का मुद्दा भी अहम है। मिडीया में युनियन नहीं है, हो भी नहीं सकती है। हम सारे इतने स्वतंत्र विचारों के है कि किसी झंडे के नीचे इकठ्ठा भी नहीं हो सकते। ऐसें में कमसे कम संगठीत होने से हमारें बीच सुरक्षा की भावना तो आ ही सकती है। दुसरी अहम बात एक जगह पर कुछ पत्रकार लाखों की सैलरी पा रहे है तो दुसरी जगह कुछ को सेंकडों तक नहीं मिल पा रहे हैं। ये फर्क क्यों है ये बात मूर्खतापूर्ण है। हर पेशे में स्कील की आवश्यकता होती है, मिडीया में काम करने वाले लोगों को भी नए स्कील सीखने होंगे। कई लोगों को अल्टरनेट मिडीया की एलर्जी है, इस नइ मिडीया को आपको सीखना होगा। व्यवस्था के साथ रह-रहकर हम व्यवस्था का हिस्सा ना बन जाए इसका ध्यान रखना होगा। संगठन के माध्यम से हर वक्त नई नई बातें सीखनी चाहीए, अपने गलतियों को स्वीकार उन्हे बदलने,दुरूस्त करने का भी काम करना चाहीए।
दुनियाभर में अन्याय अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाते वक्त हर रोज कई पत्रकार मारे जाते है, ऐसें में पत्रकारों के संगठनों की जरूरत क्यों है इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। हम अपनें अपनें इलाखों के पत्रकार संगठन चलातें है अब वक्त ये भी आ गया है की पत्रकारों का वैश्विक संगठन हो और दुनिया के पत्रकार एक हो।
⁃ रवींद्र आंबेकर
बदलतें हालातों में पत्रकारिता की दिशा और दशा भी बदली है. स्वतंत्रता के पूर्व और उसके बाद वाले पत्रकारिता और अब के जमाने की पत्रकारिता में गुणात्मक फर्क है। तब पत्रकारिता विचारों के लिए होती थी,अब विचारों के साथ खबरों के लिए भी होती है। तब दुश्मन एक था अब कई सारे है और वो भी हर वक्त बदलते रहतें है। कुछ लोग कहते है कि पत्रकारिता का स्तर फिसल गया है, इसलिए पत्रकार टार्गेट किए जाते है। मैं इस बात ये सहमत नहीं हूॅं। समाज में अच्छे बुरे लोग-संस्था-शक्ती हर क्षेत्र में होती है, पत्रकारिता में भी ऐसी बुरी शक्तीयाॅं आ चुकी है। लेकीन इसका मतलब कतई ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता का असली धर्म बदल चुका है। पत्रकारिता में आई हुई बुरी शक्तीयों से भी हमें लडना होगा। साथ ही हमें पत्रकारिता के विकास और उत्कर्ष के लिए भी लडना होगा। अगर ये काम करने से हम चूॅंक गए तो शायद इतिहास हमें माफ नहीं कर पाएगा
हमारें सामने चुनौतीयाॅं कई है, कई बार हम खुद को असहाय महसूस करतें है। हम कहने के लिए तो जनतंत्र के चौथा स्तंभ है लेकीन क्या हम स्वतंत्र है। बाकी तीन स्तंभोंको एक सुरक्षा और अधिकारीक रूप प्राप्त हुआ है। पत्रकारोंको कई बार विशेष दर्जा मिलता तो जरूर है लेकीन वो कोई अधिकारीक तौर पर नहीं। अब संविधान के निर्माताओं- रचैताओं ने ऐसा क्यों किया? क्यों मिडिया को स्वतंत्र रखा? मुझे लगता है इसका पीछे गहरी सोच है। किसी भी वक्त देश के तीन स्तंभ देश की जनता के प्रती बेईमान हो सकते है, लेकीन जनता खुद के प्रति बेईमान कैसे होगी? मिडिया जनता की आवाज है। कुछ गलत तत्व इसमें आ सकते है, जरूर आ सकते है, लेकीन वो जनता की आवाज नहीं बन सकते, और न ही जनता की आवाज दबा सकते है।
जब देश में कुछ ठीक नहीं चल रहा हो, या फिर अराजकता की स्थिती पैदा हुई हो तो क्या करना चाहीए इसका नमुना मिडिया ने हाल ही में पेश किया। हमारें संविधान ने ऐसी रचना की हुई है कि, लोगों की आवाज को कोई नहीं दबा सकता, मिडिया वाले भी नहीं। सोशल मिडिया के माध्यम से भी लोग अल्टरनेट मिडीया का रास्ता अपना रहे है। इसका विरोध नहीं करना चाहीए। जनता हमें भी सवाल पुछना चाहती है। अल्टरनेट मिडीया का हमें स्वागत करना चाहीए । इस नए माध्यम के सहारे लोग हमारी आलोचना करेंगें, दिशा देंगे, जानकारी देंगे, बदनाम भी करेंगें । ये मिडीया है, लोग जिस तरह आज इसका उपयोग कर रहें है वो मिडीया के ठेकेदारों के लिए भी एक सबक है। हमें लोगों की नब्ज और मिजाज को समझना चाहीए। उनकें मुद्दोंसे भटकना नहीं चाहीए। ऐसा करने के लिए बहुॅत साहस की आवश्यकता है।
कम पैसा, सैलरी के दम पर इतनी बडी लडाई कैसे लडे ये भी बडी समस्या है। मिडीयाकर्मीयों की सैलरी, सुरक्षा का मुद्दा भी अहम है। मिडीया में युनियन नहीं है, हो भी नहीं सकती है। हम सारे इतने स्वतंत्र विचारों के है कि किसी झंडे के नीचे इकठ्ठा भी नहीं हो सकते। ऐसें में कमसे कम संगठीत होने से हमारें बीच सुरक्षा की भावना तो आ ही सकती है। दुसरी अहम बात एक जगह पर कुछ पत्रकार लाखों की सैलरी पा रहे है तो दुसरी जगह कुछ को सेंकडों तक नहीं मिल पा रहे हैं। ये फर्क क्यों है ये बात मूर्खतापूर्ण है। हर पेशे में स्कील की आवश्यकता होती है, मिडीया में काम करने वाले लोगों को भी नए स्कील सीखने होंगे। कई लोगों को अल्टरनेट मिडीया की एलर्जी है, इस नइ मिडीया को आपको सीखना होगा। व्यवस्था के साथ रह-रहकर हम व्यवस्था का हिस्सा ना बन जाए इसका ध्यान रखना होगा। संगठन के माध्यम से हर वक्त नई नई बातें सीखनी चाहीए, अपने गलतियों को स्वीकार उन्हे बदलने,दुरूस्त करने का भी काम करना चाहीए।
दुनियाभर में अन्याय अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाते वक्त हर रोज कई पत्रकार मारे जाते है, ऐसें में पत्रकारों के संगठनों की जरूरत क्यों है इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। हम अपनें अपनें इलाखों के पत्रकार संगठन चलातें है अब वक्त ये भी आ गया है की पत्रकारों का वैश्विक संगठन हो और दुनिया के पत्रकार एक हो।
⁃ रवींद्र आंबेकर
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